Monday, July 02, 2007

गाना पहेली

ये धुन किसी गाने के बीच में बजती है। ये ओरिजनल धुन नहीं,मैंने बजाई है, इस लिए बिल्कुल वैसी तो नहीं है, फिर भी गाना बूझें। अब ये मत कहिएगा कि गाना सुना नहीं हुआ।

ये पहेली तो मैथिली जी और समीर जी ने फ़्टाक से बूझ दी है। साफ़्टवेयर से मैंने इस गाने की पहली पंक्ति नोटेशन में लिखने की कोशिश की। शायद इस साफ़्टवेयर में कभी युनिकोड में बोल लिखना संभव हो पाए।

3 comments:

maithily said...

एक रूठी हुई, तकदीर जैसे कोई
खामोश जैसे है तू, तसवीर जैसे कोई;
तेरी नजर, बनके जुबां, लेकिन तेरे पैगाम दिये जाये,
ये शाम मस्तानी, मदहोश किये जाये, मुझे डोर कोई खीचे, तेरी ओर लिये जाये.

रजनीश जी, आपने बहुत प्यारा और सुरीला बजाया है.

Udan Tashtari said...

पास बैठी है तू...ये शाम मस्तानी, मदहोश किये जाये!!

--अच्छा बजा लेते हैं..अब मैथली जी बता ही चुके है, जब तक हम टिप्पणी पर पहुँचते और हमारे प्रिय साथी हैं, तो मैं भी उन्हें बधाई दे देता हूँ. या फिर हम दोनों ही गलत साबित हो जायेंगे. :)

रजनीश मंगला said...

मैथिली जी समीर जी छा गए। हालाँकि पहेली बहुत मुश्किल नहीं थी लेकिन खेद बजाए जाने की वजह से मुझे लगता कि शायद बूझी नहीं जाएगी।